तो 'पवित्र' पक्षी ने बचाया इस तेज़ रफ़्तार ड्राइवर को?

कुछ उसे फरिश्ता बता रहे हैं, कोई पवित्र आत्मा तो कुछ कह रहे हैं कि यह महज़ इत्तेफ़ाक था.

जो भी उस घटना के बारे में सुन रहा है उसकी अपनी व्याख्या कर रहा है.

मामला जर्मनी का है. जब एक कार सवार तेज़ गति में गाड़ी दौड़ा रहा था और उसकी इस लापरवाही के चलते उसका चालान होने ही वाला था कि उसी दौरान कुछ अजीब हुआ.

हाई स्पीड की वजह से इस कार चालक को 93 पाउंड का चालान देना पड़ता लेकिन तभी एक सफ़ेद कबूतर वहां आ गया. जिसकी वजह से ड्राइवर की पहचान नहीं हो सकी क्योंकि ड्राइवर का चेहरा पक्षी के बड़े पंखों से ढंक गया था.

ईसाई मान्यताओं के मुताबिक, सफ़ेद कबूतर को 'पवित्र आत्मा का प्रतीक' माना गया है.

हल्के-फुलके अंदाज़ में जारी किए गए पुलिस के बयान में कहा गया है कि बहुत हद तक संभव है कि "पवित्र आत्मा का यह दख़ल महज़ इत्तेफ़ाक़ न हो."

बयान में कहा गया है, "हम इस इशारे को समझ गए हैं और इस बार हमने तेज़ गति से गाड़ी चलाने वाले उस शख़्स को छोड़ दिया है."

जर्मनी की पश्चिमी सीमा के पास वियर्सन के अधिकारियों का कहना है कि संभवत: यह इशारा वह कार ड्राइवर भी समझ गया होगा और भविष्य में वह इतनी तेज़ गति से गाड़ी नहीं चलाएगा.

ड्राइवर 54 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से गाड़ी चला रहा था जबकि उस सड़क पर गति की सीमा 30 किलोमीटर प्रति घंटा है.

लेकिन "पंखों वाली उस शक्ति" की वजह से सिर्फ़ कार की पहचान की जा सकी और ड्राइवर का चेहरा नहीं दिखा, इसलिए पुलिस ने भी उदारता दिखाते हुए इस बार ड्राइवर को बख़्श दिया है.

वियर्सन पुलिस ने मज़ाकिया बयान में यह भी कहा है कि उस प्रतिबंधित क्षेत्र में इतनी तेज़ गति से उड़ने के लिए पक्षी पर भी जुर्माना लगना चाहिए.

बयान में कहा गया है, "लेकिन हम नहीं जानते कि ईसाई धर्म के अगले पवित्र दिन वो कहां होगा, इसलिए हम यहां न्याय के ऊपर करुणा को प्राथमिकता दे रहे हैं."

जलवायु परिवर्तन के कारण घास के मैदान वैसे भी सिमट रहे हैं. मिट्टी का कटाव हो रहा है, झीलें और नदियां सूख रही हैं.

1990 के दशक से अब तक पशुओं की संख्या तीन गुणा बढ़ गई है. उनकी चराई से घास के मैदानों को सबसे ज़्यादा नुकसान हो रहा है.

ऐसा क्यों हो रहा है? इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है दुनिया भर में सस्ते कश्मीरी ऊन की बढ़ती मांग.

बकरियों के मुलायम ऊन का इस्तेमाल कश्मीरी जंपर बनाने में होता है. ये बकरियां भेड़ों और दूसरे मवेशियों की तुलना में घास के मैदानों को अधिक नुकसान पहुंचाती हैं.

हम सभी यह तो जानते हैं कि समंदर से लेकर नदियों तक में प्लास्टिक का स्तर ख़तरनाक स्तर तक पहुंच गया है और जलीय जीवों पर उनका असर पड़ रहा है.

लेकिन बहुत कम लोगों को मालूम है कि इस ख़तरे में वाशिंग मशीन का भी हाथ है.

सिंथेटिक फाइबर (पोलीस्टर, नाइलॉन, एक्रिलिक वगैरह) के कपड़े जब मशीन में धोये जाते हैं तो उनके रेशों से लाखों सूक्ष्म कण अलग हो जाते हैं जो वाटर ट्रीटमेंट प्लांट से होते हुए नदियों, झीलों और समंदर तक पहुंच जाते हैं.

सिंथेटिक फाइबर के इन कणों में ज़हरीले रसायन होते हैं. डिटर्जेंट और दूसरे रसायनों के साथ मिलकर वे जलीय पारिस्थितिकी तंत्र पर बुरा असर डालते हैं.

ये कण पानी से होते हुए जानवरों के शरीर में पहुंच जाते हैं.

केकड़े, झींगा, मछलियां, कछुए, पेंगुइन, सील, मैनाटीस और समुद्री ऊदबिलाव जैसी प्रजातियां इन सूक्ष्म कणों को ग्रहण कर लेती हैं.

हम जो खाना खाते हैं उनमें भी ये माइक्रोफाइबर मिलते हैं. ये माइक्रोफाइबर पाचन तंत्र को अवरुद्ध कर सकते हैं और पेट की अंदरुनी परत को नुकसान पहुंचा सकते हैं.

लकड़ी की लुगदी विस्कोस और रेयॉन बनाने के लिए आधार सामग्री है. फ़ैशन इंडस्ट्री कई तरह के कपड़े बनाने के लिए इनका इस्तेमाल करती है.

आप जो नहीं जानते वह यह है कि यह लुगदी अक्सर पुराने या लुप्त हो रहे जंगलों के पेड़ों से निकाली जाती है.

मतलब यह कि जो कपड़े हम खरीदते और पहनते हैं उनका सीधा संबंध जंगल की कटाई से है.

हर साल 15 करोड़ से ज़्यादा पेड़ कपड़े बनाने के लिए काटे जा रहे हैं.

कुछ बड़े नाम वाले ब्रांड प्रमाणित जंगलों से ही विस्कोस इकट्ठा करते हैं. लेकिन इंडोनेशिया, कनाडा और अमेजॉन क्षेत्र में लुगदी के लिए काटे जाने वाले पेड़ों की संख्या बढ़ रही है.

Comments

Popular posts from this blog

稀土之争:特朗普的太空采矿之梦

港媒揭暑期“黑工”害学生 上街搞事惨变乱港炮灰

香港抗议:艺术如何成为一种武器